हर रोज कमसकम एक बार वो मुस्कुराता चेहरा दिखता जरूर था,
कभी सड़क किनारे तो कभी गलियों में मशगूल था,
उसके नादान से चेहरे पर शिकन तो नहीं थी मगर,
ख़ामोशी खुदबखुद बयां करती थी कि वो मजबूर था,
अक्सर दफ्तर जाती बड़ी कारों के बंद शीशों के उस पार,
मैंने उन छोटे हाथो को बड़ी उम्मीद लगाये देखा है.
मोहल्ले के कूड़ेदान में मिली बिना सिर वाली गुड़िया से खेलकर,
उसे खोये बचपन को बचपन बनाते देखा है।
कभी सड़को पे किताबों के पुलिंदे तो कभी खिलौने बेचकर,
कभी नुक्कड़ पे चाय की थड़ियो के गंदे बारदान समेटकर,
दिन भर दौड़ते भागते, डांट मार खाते, पसीना बहाते,
रात, तारों की रोशनी में उसे भविष्य खोजते देखा है।
न जाने क्यों, उस पराये, अजनबी से अनजाना सा रिश्ता जुड़ गया,
हफ्तों बीत गए देखा नहीं उसको कि बेचैनी हो गयी।
बहुत पूछताछ की पर उसका कोई सुराग न मिल पाया,
फिर ना ही कभी वो गली चौराहे और नुक्कड़ पर नज़र आया।
वो जिन्दा है की नहीं इस दुनिया में, इस बात की खबर नहीं,
पर एक अफ़सोस आज भी जिन्दा है जेहन में उसके लिए।
शायद में एक बार पूछ पाता उसकी मजबूरी,
या कर पाता उसकी कोई ख्वाहिश पूरी।
अब पछताने से कुछ बदल तो नहीं जायेगा,
लेकिन वो "बाल श्रमिक" हरदम याद आएगा।
"Dev~